कैपिटल इकोनॉमिक्स के विश्लेषकों के अनुसार, उभरते बाजारों में अग्रणी के रूप में चीन की लंबे समय से चली आ रही स्थिति अब अपने अंत के करीब पहुंच रही है। वर्ष 2000 से, चीन की अर्थव्यवस्था अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में तेज़ी से बढ़ी है, सिवाय महामारी के दौरान एक छोटे से गिरावट काल के। हालांकि, इस थिंक टैंक का अनुमान है कि आधिकारिक आंकड़ों के बावजूद आने वाले वर्षों में चीन की आर्थिक वृद्धि उभरते बाजारों के औसत से कम रहेगी।
इस सुस्ती के मुख्य कारण निर्माण और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में घटती गति और बढ़ता सरकारी कर्ज हैं। अनुमान है कि 2030 तक चीन की जीडीपी वृद्धि घटकर लगभग 2% रह जाएगी। इससे वस्तुओं (कमोडिटीज़) की मांग में तेज गिरावट आएगी, जो दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करेगी, साथ ही तेल की कीमतों पर नकारात्मक प्रभाव के कारण खाड़ी देशों (पर्शियन गल्फ) के आर्थिक दृष्टिकोण को भी धूमिल कर देगी।
कुल मिलाकर, चीन अब उभरते बाजारों में निर्विवाद नेता के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है। यह परिवर्तन वैश्विक अर्थव्यवस्था और कई वस्तु-निर्यातक देशों पर अपनी छाप छोड़ेगा।