विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक स्तर पर उच्च महंगाई 2027 तक बनी रह सकती है।

रॉयटर्स द्वारा अक्टूबर में 500 से अधिक वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों के बीच किए गए सर्वेक्षण के नतीजों के अनुसार, ऊर्जा की कीमतों में लगातार वृद्धि और लंबे समय से जारी भू-राजनीतिक संघर्षों के कारण दुनिया की अधिकांश प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में उच्च महंगाई 2027 तक बनी रहने की संभावना है।

सर्वेक्षण में शामिल 50 देशों में से 31 देशों के लिए विश्लेषकों ने अगले साल उपभोक्ता कीमतों में वृद्धि के अपने अनुमान बढ़ा दिए हैं। इनमें 21 विकसित अर्थव्यवस्थाओं में से 15 देश शामिल हैं। वहीं, 23 देशों के आर्थिक विकास के अनुमानों को भी बढ़ाया गया है। यह इस असामान्य स्थिति को दर्शाता है, जिसमें कीमतों पर लगातार दबाव बने रहने के बावजूद कारोबारी गतिविधियां मजबूत हो रही हैं।

मौजूदा स्थिति वसंत और गर्मियों में लगाए गए उन अनुमानों से अलग है, जिनमें स्टैगफ्लेशन (आर्थिक ठहराव के साथ महंगाई) की सामान्य स्थिति बनने की आशंका जताई गई थी।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीकों में बड़े पैमाने पर निवेश और उपभोक्ताओं की मजबूत मांग ने आर्थिक उत्पादन को बनाए रखने में मदद की है। लेकिन इस आर्थिक मजबूती का दूसरा पहलू यह है कि महंगाई लगातार बनी हुई है।

महंगाई के दबाव का मुख्य कारण तेल की कीमतें हैं। ईरान संघर्ष बढ़ने के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में 60% से अधिक की वृद्धि हुई है। तेल लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा है और एक समय 117 डॉलर तक पहुंच गया था।

HSBC और Morgan Stanley के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ऊर्जा कीमतों में आए इस झटके का असर अब कोर महंगाई (Core Inflation) के आंकड़ों में भी दिखाई देने लगा है। कोर महंगाई की गणना करते समय ईंधन और खाद्य पदार्थों जैसी अस्थिर कीमतों के सीधे प्रभाव को हटा दिया जाता है।

रॉयटर्स के पिछले तीन सर्वेक्षणों के दौरान 2027 के लिए महंगाई के औसत अनुमानों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है:

यूनाइटेड किंगडम: महंगाई का अनुमान 0.7 प्रतिशत अंक बढ़ा।यूरो क्षेत्र: 0.5 प्रतिशत अंक बढ़ा।अमेरिका: 0.2 प्रतिशत अंक बढ़ा।ब्राजील: 0.5 प्रतिशत अंक बढ़ा।भारत: 0.4 प्रतिशत अंक बढ़ा।

यदि कीमतों में वृद्धि के दूसरे दौर के प्रभाव (Second-round Effects) फैलते रहते हैं, तो केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरों को बाजार की मौजूदा अपेक्षाओं से अधिक समय तक ऊंचे और सख्त स्तर पर बनाए रखना पड़ सकता है।

स्थिति को वैश्विक सरकारी बॉन्ड बाजार में जारी बिकवाली ने और जटिल बना दिया है। बॉन्ड की यील्ड (प्रतिफल) बढ़ने के कारण कंपनियों और आम परिवारों के लिए कर्ज लेना पहले ही काफी महंगा हो चुका है।